निराश्रितों के भगवान: श्री भगवान सिंह परिहार

अवतरण -12 अक्टूबर, 1928 । दिव्यलोक गमन - 07 दिसम्बर, 2015

'संवेदना' कहने को तो मात्र अक्षरों का शब्द है लेकिन यही वो विशिष्ट अनुभूति है तो मनुष्य को शेष जीवों से अलग करके उसे 'मानव' कहलाने का गौरव प्रदान करती है। सकारात्मक सन्दर्भ में देखो तो 'संवेदना' ही मानव जीवन का वह महान पक्ष है जो उसे विश्व-कल्याण की प्रेरणा देता हैं।

सनातन संस्कृति में संवेदना को 'नारायण भाव' कहा गया है दया, करूणा, और ममता की पावन त्रिवेणी इसी भाव से उद्घाटित होती है। संवेदनशीलता की प्रतिमूर्ति और 'नारायण भाव' के साक्षात् प्रतीक श्री भगवानसिंह परिहार इस त्रिवेणी के संगम स्थल हैं। दीन-दुखियों और पीड़ित मानवता को कष्टों से मुक्ति दिलानें के लिए निरपेक्ष भाव सेवा में जुटे इस सत्कर्मी प्रेरणादीप का प्रज्जवलन माता श्रीमती मानीदेवी की कोख से पिता श्री शिवराम सिंहजी परिहार के यहाँ दिनांक 12 अक्टूबर, 1928 को (बाकिया बेरा पूँजला, जोधपुर) हुआ। घर पवित्र उजाले से भर गया। आपके पिताजी शान्तचित, मेहनती और गुणवान व्यक्तित्व के धनी थे, मेशन कार्य से सम्बद्ध होने के साथ आप कृषि कार्य भी करते थे। इस तरह श्रमशील चरित्र और जीवन संघर्ष की सीख श्री भगवान सिंह जी परिहार को विरासत में प्राप्त हुई।

आपकी प्रारम्मिक शिक्षा सुमेर स्कूल मे हुई। तत्पश्चात् आपने बी.एस.सी., एल.एल.बी तक विद्यार्जन किया। विधि की विडम्बना ही थी कि आपकी बाल्यावस्था में ही आपके पिता श्री शिवराम सिंह जी परिहार का असामयिक निधन हो गया और छोटी सी उम्र में ही आप पर अनेक जिम्मेदारियाँ आ पड़ी। कठिन और चुनौतीपूर्ण हालातों ने आपको मजबूत इरादो के साथ परिपक्व बनने में मदद की। आश्चर्य मिश्रित गर्व होता है कि विपरीत परिस्थितियां होते हुए भी अपने शिक्षा का दामन नही छोड़ा और बच्चों को ट्यूशन कराने के साथ बी.एस.सी. किया। तात्कालिक समय में यह बड़ी उपलब्धि थी।

अध्ययनोपरान्त आप बतौर कस्टम अधिकारी सीमावर्ती जिले बाड़मेर में नियुक्त हुए। ईमानदारी आपके खून मे थी, किसी मामले में आपको रिश्वत का ऑफर हुआ जिसे आपने ठुकरा दिया पर उच्चाधिकारी द्वारा रिश्वत लेकर उस मामले को रफा-दफा करने से आप अत्यधिक व्यथित हुए। आपने त्यागपत्र दे दिया और नई राह पर निकल पड़े। इसकी शुरूआत आपने भीलवाड़ा की 'माइका माइन' से की, फिर आप ठेकेदारी लाइन में आए और अनेक निर्माण कार्य किए। इसी सिलसिले में आपको जोधपुर के निकट स्थित माणकलाव गाँव में 'अफीम मुक्ति संस्थान एवं इससे सम्बद्ध इमारतों का निर्माण करने अवसर मिला। यहीं पर आपके NGOs से सम्बन्धित सेवा-कार्यो को करीब से देखने-समझने का मौका मिला साथ ही विशेषज्ञों से आपकी बातचीत व परामर्श भी हुआ। सम्भवताया यहीं से आपके संवेदनशील मन की उर्वरा भूमि पर सेवा नाम के सत्कर्म का बीजांकुरण हुआ।

आपके जीवन में उस समय नया मोड़ आया जब आपने को-ऑपरेटिक बेसिस संस्था की स्थापना की श्री माधोसिंह कच्छवाह के साथ मिलकर उस आगे बढ़ाया। इसी समय लक्ष्मी उद्योग स्थापित हुआ अपने साथियों के साथ मिलकर आपने इस मजबूती प्रदान की।

इस अवधि मे कई उतार-चढ़ाव भी आए पर इरादों के धनी श्री भगवान सिंह परिहार विचलित नही हुए और संघर्ष के साथ आगे बढ़ते रहे। इसी बीच आपको ओ.एन.जी.सी. जो मरूस्थलीय क्षेत्र मे तेल की खोज कर रही थी, से सम्पर्क करने का मौका मिला। इस अवसर को आपने हाथ से न जाने दिया और ओ.एन.जी.सी. को अपने विश्वसनीय उत्पादों की पूर्ति प्रारम्भ की। इससे ओ.एस.जी.सी. को भी समय व बचत का लाभ हुआ। इसके बाद आपने कभी पीछे मुड़कर नही देखा। सच्चाई, ईमानदारी मेहनत, विश्वास और लगन के बूते पर आपने लक्ष्मी उद्योग को नई ऊँचाईयां दी।

कहते है 'जहाँ चाह-वहाँ राह' आपके सेवा भाव की तीव्र उत्कण्ठा ने उक्त समस्या का भी समाधान निकाल लिया और आपने अपने सेवा सहयोगियों, के साथ मिलकर 'नवजीवन संस्थान' नामक संस्था का गठन किया। वर्ष 1989 में इस संस्था की पहली इकाई अनाथ, अनचाहे या तिरस्कृत बच्चों की देखभाल को समर्पित 'लव-कुश- बाल विकास केन्द्र के नाम से स्थापित हुई। बॉम्बे मोटर्स के पास महेन्द्रा कॉम्पलेक्स में आप द्वारा पूर्व संचालित लक्ष्मी चेरीटेबल ट्रस्ट के फ्लेट मंे इस केन्द्र का शुभारम्भ किया । 'लव-कुश' केन्द्र को आपके समर्पण भाव से बहुत सफलता मिली, नतीजतन सेवा क्षेत्र मंे 'नवजीवन संस्थान' एक उदाहरण के रूप में प्रतिष्ठित कार्यशौली इतनी समर्पित और दुरस्त है कि एक अबोध शिशु के समूचे जीवन के सभी पक्षों को यहाँ आकर ही देखा-समझा और सन्तुष्ट हुआ जा सकता है। विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए वर्तमान समय में यह केन्द्र 16 सेक्टर, चौपासनी हाऊसिंग बोर्ड जोधपुर में स्वयं के भवन में संचालित हो रहा है।

बच्चांे के प्रति पितातुल्य स्नेह रखने व सेवा के प्रति अपने जुनूनी समर्पण से लोगो ं के दिलों में जगह बना लेने का ही परिणाम है कि आप 'बाऊजी' के आदरणीय सम्बोधन से सर्वविदित हैं। इसे विडम्बाना ही कहा जाएगा कि आज भी समाज में बेटा-बेटी के लिंग भेद की वजह से निराश्रित कन्याओ को लड़को की तुलना में गोद कम लिया जाता है गायत्री बालिका गृह की बालिकाओं को यहाँ बाऊजी और उनके सहयोगियों का अपार स्नेह उस गोद की कमी को कभी अनुभव नहीं होने देते है। वयस्क हुई बालिकाओं के विवाह हेतु समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर कड़ी जाँच-परख उपरान्त उनके जीवन साथी का चयन स्वयं बालिकाओं की रजामंदी से किया जाता है। हर तरह से सन्तुष्ट होने के बाद बालिका को विवाह चयनित योग्य वर के साथ किया जाता है। बाऊजी के स्नेहशील आशीर्वाद से अब तक इस संस्था ने 12 बालिकओं का विवाह सम्पन्न करवाया है। इतना ही नही विवाह उपरान्त प्रसव होने पर जब उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिलती है तो बाऊजी उन्हे सीधे अपने घर ले जाते है जहाँ आपकी बहुरानी श्रीमती शोभा परिहार सहित सभी परिजन मिलकर उनकी सेवा-सुश्रुषा करते है, तत्पश्चात् निश्चित समय पर उन्हें सामाजिक रीति-रिवाज सम्पन्न कर पीहर भेंट (सीख) देकर भावपूर्ण विदाई देते है।

आपकी संवेदनशील प्रवृति और सेवाभावी सोच ने आपका ध्यान उन बुजुर्गो की ओर आकृष्ट किया जो पाश्चात्य प्रभाव एवं एकाकी परिवार प्रणाली के प्रचलन से परिवार में उपेक्षा का अनुभव करते है। इस पीड़ा को आपने अपने सहयोगियों से बाँटा, बुजुर्ग लोगों के सम्मानित जीवन पर मंथन होने लगा। चिन्तन-मनन के साथ यह विचार जोधपुर राजमाता श्रद्धेय कृष्णाकुमारी जी व कुछ आत्मीयजनों तक जा पहुँचा। सभी ने बुजुर्गो को उनकी इच्छानुसार जीवन जीने के अवसर देने के लिए आपको एक वृद्धाश्रम स्थापित करने को प्रोत्साहित किया। कहते है- ' अच्छी शुरूआत-आधा काम' हो जाने के समान है। यही हुआ, ईश्वरीय संयोग से श्री सुमेरमल जी बोहरा की ओर से इस पवित्र कार्य हेतु एक बड़ी भूमि दान करने का प्रस्ताव आया। देखते ही देखते वृद्धजन आश्रम के रूप में वर्ष 2007 में यह सपना ' वरिष्ठ नागरिक सदन' बनकर सच हुआ। वरिष्ठजनों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इस सदन को नाम 'आस्था' रखा गया। यहाँ वरिष्ठजनों के लिए सभी आवश्यक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध है और इससे भी बढ़कर यहाँ उन्हें जो आदर व अपनत्व मिलता है वह उन्हें हर्ष से भर देता है। बाऊजी तो स्वयं इनके बीच यहीं रहने भी लगे थे।

मानवता के मसीहा ने प्राणी मात्र के लिए कुछ किया। मानवता की यह निःस्वार्थ सेवा ही आपकी तपस्या, साधना थी। आपकी इस साधना के समक्ष हम सब श्रद्धानवत है। स्वयं मानवता आपकी इस सेवा के लिए धन्य है आपके माता-पिता जिनकी कोख को आपने अपने पुरूषार्थ से पवित्र किया था।