श्री छगन राव भुजबल, उप-मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र


आपका जन्म 15 अक्टूबर, 1947 को पूना जिले के एक गाँव में एक किसान परिवार में जो फलों का धंधा करते थे, हुआ। आपने मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त कर नौकरी तो नहीं की परन्तु राजनीति में आ गए। आपने माली सैनी समाज ही नहीं समस्त पिछड़े वर्ग में राजनैतिक शैक्षिक, सामाजिक जागृति का संचार किया। आप पिछड़े वर्ग के सक्रिय बलशाली नेता माने जाने लगे। आप बम्बई आ गए और महानगरपालिका के 1973 में सदस्य चुने गये तथा 1984 तक महानगरपालिका में विरोधी पक्ष के नेता के रूप में कार्य किया। सन् 1985 से 1991 तक दो बार मुंबई के मैयर चुने गए। आपने मुम्बई में नगरीय सौन्दर्यीकरण, झोंपड़पट्टी सुधार के महत्वपूर्ण कार्य किए। आपनें 1980 से 1986 तक विदेशों का (जैसे अमेरिका, फ्राँस, इंग्लैण्ड, जर्मनी, न्यूजीलैण्ड, बैल्जियम, स्वीटजरलैण्ड आदि देशों का) व्यापक भ्रमण किया। सन् 1990 में आप ऑल इण्डिया मैयर काउन्सिल के अध्यक्ष पद पर भी रहें। 1996 में जापान में महापौर के शिष्टमण्डल नेता के रूप में भाग लिया। आपने महाराष्ट्र, कर्नाटक सीमा विवाद को निपटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूने में महात्मा ज्योतिबा फुले के घर को राष्ट्रीय स्मारक बनाने में आपका पुर्ण सहयोग रहा। आपका उपेक्षित पिछड़ों के लिए मण्डल आयोग पर अमल करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा तथा राजनैतिक, शैक्षिक, सामाजिक जागृति लाने में उनका मार्गदर्शन किया। महात्मा ज्योति बा फुले, सावित्री बाई फुले, छत्रपति शिवाजी महाराज, डॉ. भीमराव अम्बेडकर के कार्यो का प्रचार-प्रसार करने में आपका पूर्ण योगदान रहा। आप लम्बे समय तक शिव सेना के प्रमुख नेताओं में रहें। परन्तु वहाँ पर पिछड़ों की अनदेखी पर आपने शिवसेना के पद से त्याग-पत्र दे दिया। 18 दिसम्बर, 1991 को आपने बारह शिवसेना विधायकों के साथ त्याग-पत्र देकर काँग्रेस पार्टी में प्रवेश लिया। 21 दिसम्बर, 1991 से सुधाकर राव नाईक मंत्री मण्डल में राजस्व व नगर विकास कैबिनेट मंत्री पद पर रहें। 6 मार्च, 1993 को शरद पंवार मंत्री मण्डल में गृह निर्माण मंत्री पद का भार संभाला। सन् 1999 से आप राष्ट्रवादी काँग्रेस सरकार में उपमुख्य मंत्री पद पर आसीन हुए और महाराष्ट्र में विकास के कई कार्य करवा दिए। आप महालक्ष्मी प्रतिष्ठान चैरिटेबल ट्रस्ट पुणें के संस्थापक अध्यक्ष तथा महात्मा फुले विकास सेवा संस्था, पुणें के संस्थापक अध्यक्ष पद पर रहे हैं और फुले की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं।