सामाजिक क्रान्ति के जनक: महात्मा ज्योति राव फुले


सामाजिक क्रांति से अभिप्राय हिन्दू- हिन्दुत्व की परम्परागत सामाजिक, धार्मिक रूढ़िवादी कुरीतियों के विरूद्ध आंदोलन करने से है। सामाजिक क्रांति का प्रथम तथा अन्तिम लक्ष्य सामाजिक - धार्मिक पुनर्जागरण आंदोलन और सांस्कृतिक नवोत्थान की प्रक्रिया को गति एवं दिशा प्रदान करना हैं

भारत के धार्मिक-सामाजिक नवोत्थान के पुरोधाओं राजा राममोहन राय (1722-1833), महात्मा ज्येातिराव फुले (1827-1890), स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883), महादेव गोविन्द रानाडे (1942-1901) में से सामाजिक क्रांति के जनक के रूप में केवल महात्मा ज्योतिबा फुले की गणना की जा सकती है। महात्मा फुले के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होकर विनायक दामोदर सावरकर (1833-1966) तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर (1891-1956) ने सामाजिक क्रांति के स्वर और आंदोलन को आगे बढाया। डॉ. अम्बेडकर तो महात्मा फुले के व्यक्तित्व - कृतित्व से अत्यधिक प्रभावित थे। वे महात्मा फुले को अपने सामाजिक आन्दोलन की प्रेरणा का स्त्रोत मानते थे। 28 अक्टूबर 1954 को पुरूदर स्टेडियम, मुम्बई में भाषण देते हुए उन्होने महात्मा बुद्ध तथा कबीर के बाद महात्मा ज्योतिबा फुले को अपना तीसरा गुरू माना है। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा- And my third Guru is Jyotiba Phooley. It is only phooley who taught the lessons of humanity. In earlier political movement, we all were going on the path of Jyotiba, my life is influenced by their teachings(अर्थात् मेरे तृतीय गुरू ज्योतिबा फुले है। केवल उन्होनें ही मानवता का पाठ पढाया। प्रारम्भिक राजनीतिक आन्दोलन में हमने ज्योतिबा के पथ का अनुसरण किया। मेरा जीवन उनसे प्रभावित हुआ है।) गोविन्दराम-चिमणाबाई फुले दम्पति के परिवार में पुणे में 11 अप्रेल 1827 को ज्योति राव फुले का जन्म हुआ। उन्होने मराठी शिक्षा(1834-38) तथा बाद में स्कॉटिश मिशन स्कूल में अंग्रेजी शिक्षा (1841-47) प्राप्त की। 1840 में उनका विवाह 9 वर्षीय सावित्रि बाई (1831-1897) से हुआ। युवक फुले के व्यक्तित्व निर्माण में ईसाइयत के उदारवाद, अमेरिकी लेखक टामस पेन के ग्रंथ ‘राइट्स आफ मैन‘ तथा ‘दी एज ऑफ रीजन‘ का प्रभाव पड़ा। उन्होने अस्पृष्य जाति के लहू की मांग से तलवार-भाला आदि चलाने का शारीरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। छत्रपति शिवाजी, वाशिंगटन और मार्टिन लूथर के जीवन चरित्रों के अध्ययन से युवक ज्योति स्वतंत्रता, समानता और उदारवादी चिंतन के प्रबल पक्षधर बने।

सामाजिक क्रांतिकारी और उनका सामाजिक चिंतन शून्य नहीं होता है। उसके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ होते है। पुणे में 1848 में अपने ब्राह्मण मित्र सखाराम यशवंत परांजयें के विवाह में बाराती के रूप में शामिल होने पर एक रूढ़िवादी ब्राह्मण ने युवक ज्योति राव का घोर अपमान करते हुए कहा-‘अरे शूद्र! ब्राह्मणों के साथ चलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई? तूने तो जातीय व्यवस्था की सारी मर्यादाएं ही तोड दीं। ’ अपमानित युवक ज्योति राव ने यह अनुभव किया कि राजनीतिक दासता की तुलना में सामाजिक दासता अधिक अमानवीय और अपमानजनक होती है। इस प्रकार सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना उनके जीवन संघर्ष का प्राथमिक तथा अंतिम लक्ष्य बन गया।

शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हुए फुले दम्पती ने 1848 में सर्वप्रथम पुणें में बुधवार पेठ में श्री भिन्डे के मकान में अपनी प्रथम कन्याशाला प्रारम्भ की। कन्या शिक्षा विरोधी भू-देवों के विरोध के कारण फुले दम्पती को 1849 को अपना पितृ गृह छोड़ना पडा़। मुम्बई सरकार के अभिलेखों में ज्योतिबा फुले द्वारा पुणे तथा उसके पास के क्षेत्रों में शूद्रादि बालक-बालिकाओं के लिये कुल 18 विद्यालय खोले जाने का उल्लेख मिलता है। 1855 में उन्होनें पुणें में भारत की प्रथम रात्रि प्रौढ़शाला और 1852 में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना की।

ज्योतिबा ने 1851 में ‘फिमेल एज्यूकेषन सोसायटी’ तथा सितम्बर 1853 में ‘सोसायटी फॉर प्रमोटिंग दी एज्यूकेशन ऑफ महारस एंड मांगस’ की स्थापना करके शिक्षा प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया। कन्या शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान के कारण मुम्बई (महाराष्ट्र) सरकार की ओर से उन्हे पुणे के संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य मेजर कैंडी ने 16 नवम्बर 1852 को 193 रूपये के दो शॉल भेंट कर सम्मानित किया। उन्होनें रूढ़िवादी सामाजिक- धार्मिक व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह किया। जैसेः-  विधवा विवाह का समर्थन किया और महात्मा फुले ने एक शेनबी युवती का पुनर्विवाह 8 मार्च 1860 को कराया।  बाल हत्या प्रतिबंधक गृह तथा विधवा प्रसूति गृह 1863 में खोला। इसमें एक ब्राह्मण विधवा काशीबाई का प्रसव कराके 1874 में उसके पुत्र यशवंत को गोद लिया।  बम्बई में नाइयों से यह प्रतिज्ञा करवाई कि वे विधवा मुंडन का कार्य नहीं करेगें।  1866 में उन्होने अपने घर का कुऑं पानी पीने के लिये अतिशूद्रों के लिए खोल दिया।  ज्येातिबा ने सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितम्बर 1873 को की। यह उनके विचारों का संस्थाकरण था। इसके तत्वाधान में बिना ब्राह्मण पुरोहित के विवाह 25.12.1873 व 07.05.1874 को कराए। इस विवाह विषयक मुकदमें में ज्येातिबा फुले की जीत उस समय हुई, जब बम्बई उच्च न्यायालय ने जनवरी 1890 में इसे वैध घोषित कर दिया। यह निर्णय सुधारवाद के पक्ष में सामाजिक रूढ़िवाद की पराजय का प्रतीक था।  ज्योतिबा पुणे में दयानन्द सरस्वती के जुलूस में शामिल हुए(सितम्बर 1875)  मुम्बई मे 1890 में एक महिला को देवदासी (भगवान के साथ) होने से रोका। इससे मुम्बई में वैचारिक भूकम्प आ गया। 1855 में ज्योतिबा ने अपने नाटक तृतीय रत्न में ब्राह्मण वाद का घोर विरोध किया था। फलस्वरूप कट्टरवादियों ने उनकी हत्या के लिये 1856 में रामोशी रोड़ मांग और धोंडीराम नामदेव कुम्हार को 1000-1000 रूपये का प्रलोभन लेकर तैयार किया। एक सामाजिक कर्मण्यवादी विचारक के रूप में ज्येातिबा की सम्पूर्ण महाराष्ट्र में पहचान स्थापित होने के कारण उन्हे पुणे नगरपालिका का सदस्य (1876-1880) मनोनीत किया गया। 11 मई 1888 को बम्बई में मांडवी स्थित कोलीबाड़ा के सभागार में समाज के सभी वर्गों ने सार्वजनिक अभिनन्दन किया। उन्हें महात्मा की जनउपाधि से विभूषित किया गया।  साहित्य और विचार:-महात्मा फुले भारत के प्रथम सामाजिक क्रांतिकारी थे जिन्होनें हंटर आयोग(1882) को प्रस्तुत स्मृति पत्र में शिक्षा के फिल्टर डाउन सिद्धान्त का विरोध करते हुए अनिवार्य शिक्षा पर बल दिया। उन्होनें किसान का कोडा़ (1883 परन्तु 1967 में प्रकाशित) में किसानों तथा कृषि व्यवस्था की दुर्दषा के लिये ऋणग्रस्तता, अनावश्यक लगान, जनसंख्या का कृषि भूमि पर दबाव, स्वदेी हस्तशिल्प का पतन, विलायती ऋण तथा ब्याज, सिंचाई हेतु बांधों का अभाव, नमक कर और अविद्या को सब अनर्थों का मूल बताया। उन्होनें पशु नस्ल सुधार तथा भारतीय किसानों को प्रशिक्षण हेतु इंग्लैण्ड भेजने और प्रतिवर्ष किसान सम्मेलन के आयोजन पर बल दिया। महात्मा फुले ने अपनी प्रत्येक पुस्तक में शूद्राति शूद्रों के शोषण का विरोध करते हुए सामाजिक समानता का समर्थन किया । उन्होनें गुलामगिरी (1873) में लिखा - ‘‘ हर मनुष्य को आजाद होना चाहिए, यही उसकी बुनियादी जरूरत है। आजाद होने से मनुष्य अपने सभी मानवीय अधिकार प्राप्त कर लेता है और असीम आनन्द का अनुभव करता है।’’ उन्होनें अपनी पुस्तक ‘‘ सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक’’ (1898) में ‘अल्लाह, गॉड, ईष्वर तथा ब्रह्म ’ के स्थान पर ‘निर्माण कर्ता शब्द का प्रयोग किया। वे प्रथम राष्ट्रवादी थे जिन्होने 1869 में छत्रपति शिवाजी की समाधी की खोज रायगढ़ में की। महात्मा फुले श्रमिक आन्दोलन के भी संस्थापक थे।  महात्मा फुले सामाजिक-ऐतिहासिक अन्तर्दृष्टि के धनी प्रथम सामाजिक शक्ति थे जिन्होने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक सत्यशोधक समाज के लिए उपयुक्त मंगल गाथाएं में तथा पत्र व्यवहार में ‘सत्यमेव जयते’ शब्द का प्रयोग किया। बाद में 26 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे अपनाया।  जीवन पर्यन्त दलित वर्ग के उत्थान तथा सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के विरूद्ध संघर्ष करते रहना ही महात्मा फुले के जीवन की कर्मरेखा और भाग्य रेखा थी। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले के संघर्षपूर्ण जीवन का अन्त हुआ। 3 नवम्बर 2003 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद भवन के परिसर में महात्मा फुले की प्रतिमा का अनावरण करके उनके व्यक्तिव- कृतित्व को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान की।