महिला सशक्तिकरण अवधारणा एवं आंदोलन की आद्य प्रवर्तक श्रीमती सावित्री बाई फुले


इस देश की महिलाओं में सावित्रीबाई ही प्रथम षिक्षित स्त्री, प्रथम अध्यापिका, भारत की सभी जातियों की प्रथम नेता और अस्पृष्यता का जमकर विरोध करने वाली प्रथम कार्यकर्त्री थी। महात्मा ज्योतिबा फुले के कार्यो में उनकी अटल निष्ठा थी।

श्रीमती फुलवताबाई झोडके (फुले दम्पती के जीवन संघर्ष से सुपरिचित मराठी लेखिका) महात्मा ज्योतिराव फुले (11 अप्रेल 1827-28 नवम्बर 1890) की पत्नी श्रीमती सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) न केवल भारत की प्रथम अध्यापिका थी, बल्कि वह नारी सामाजिक चेतना तथा आधुनिक शब्दावली में महिला सशक्तिकरण अवधारणा एवं आन्दोलन की आद्य प्रवर्तक थी। वह न केवल शूद्रातिशूद्रों तथा नारी शिक्षा आन्दोलन की साहसी अग्रदूत थी, बल्कि एक कुशल सामाजिक संगठनकर्ता भी थीं। वह न केवल महात्मा फुले की अटूट आस्थावान सहचर, सहभागी और अर्द्धागिनी थीं। बल्कि भारत की प्रथम महिला साहित्यकार (कृतिः काव्य फुले 1854) भी थीं। वह 19 वीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण एवं सांस्कृतिक नवोत्थान युग की प्रथम सामाजिक कर्मण्यवादी महिला विभूति थीं। कृतज्ञ राष्ट्र का यह सामाजिक दायित्व है कि वह सामाजिक क्रान्ति ज्योति सावित्रीबाई फुले की पुण्य स्मृति में उनकी जन्मतिथि (3 जनवरी) पर महिला साक्षरता दिवस तथा पुण्य तिथि का आयोजन महिला सशक्तिकरण दिवस के रूप में करें।

जन्म और विवाहः महाराष्ट्र के एक छोटे-से ग्राम नायागांव (तहसील खंडाला, जिला सतारा) में 3 जनवरी 1831 को खंडोजी नेवसे पाटिल के परिवार में सावित्रीबाई का जन्म हुआ। धनकवाड़ी के पाटिल (गांव मुखिया) की बेटी सगुणाबाई क्षीरसागर महात्मा ज्योति बा फुले की मौसेरी बहन थी। वह बाल विधवा थी। उसने शिशु ज्योतिराव फुले का पालन-पोषण किया था। उसके प्रयत्नों से युवक ज्योति का विवाह नायगांव में सावित्रीबाई के साथ 1840 ई. में हुआ। उस समय युवक ज्योति की आयु 13 वर्ष और सावित्री की आयु 9 वर्ष थी।

सामाजिक कार्य:- ज्योतिबा और उनकी पत्नी सावित्रीबाई का सामाजिक कार्य अलग-अलग करके देखना असम्भव है। दोनों दो शरीर अवश्य थे, परन्तु उनकी आत्मा एक थी। ज्योतिबा मार्गदर्शक थे तो सावित्रीबाई सामाजिक क्रान्ति की ज्योति की वाहक थी। फुले दम्पति दो सामाजिक शक्तियों का एकाकार रूप था।

फुले दम्पति ने नारी मुक्ति के लिए परम्परागत रूढ़ियों का खण्डन किया। सती प्रथा तथा विधवा मुंडन का विरोध तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। सावित्रीबाई ने नारी शिक्षा के कार्य में ज्योतिबा का जो योगदान किया वह अक्षुण्ण है।

फुले दम्पति ने जनवरी 1863 में विधवाओं के अवैध बच्चों के लालन-पालन के लिए सन् 1963 में बाल हत्या प्रतिबन्ध गृह खोला और विधवाओं की गुप्त तथा सुरक्षित प्रसूति के लिए प्रसूतिगृह खोला। प्रसूतिगृह में जन्में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राह्मण नारी के बच्चें (यशवन्त) को गोद लिया। बालक यशवन्त बाद में डॉक्टर बन गया। 4 फरवरी 1889 को उसका विवाह राधाबाई पुत्री कृष्णराय ससाणे से करके समाज सुधार का एक आदर्श प्रस्तुत किया। महाराष्ट्र में यहीं सर्वप्रथम अन्तर्जातीय विवाह था। ज्योतिबा के देहावसान के बाद आठ वर्षों तक सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज (स्थापना वर्ष सितम्बर 1873) का कार्यभार सम्भाला।

साहित्य और विचार:- सावित्रीबाई श्रेष्ठ अध्यापिका, प्रभावशाली वक्ता, कुशल प्रशासिका, लेखिका और कवयित्री थी। उसका ‘काव्यफुले‘ शीर्षक काव्य संग्रह 1854 में प्रकाशित हुआ। उनके द्वारा रचित ग्रन्थ निम्न हैं: 1. काव्यफुले (1854), 2. मातुश्री सावित्रीबाईची भाषणे व वाणी - विषय उद्योग व विद्यादान (1891) 3. बावन कशी सुबोधरत्नाकर (काव्य संग्रह) 4. ज्योतिबांची भाषणे भाग 1 से 4 (सं. सावित्रीबाई) 5. सावित्रीबाई के विविध विषयों पर भाषण 6. सावित्रीबाई द्वारा ज्योतिबा को लिखे गए दो पत्र।

नारी चेतना की प्रणेता:- नारी शिक्षा के क्षेत्र में अपने ज्योतिबा को समर्पित भाव से सक्रिय सहयोग देकर सावित्रीबाई ने भारतीय नारी के इतिहास में एक नए अध्याय का सूत्रपात किया। इस सन्दर्भ में मामा परमानन्द ने 31 जुलाई 1890 को बड़ौदा रियासत के दीवान घामणस्कर को लिखे पत्र में कहा- ‘‘ज्योतिराव से भी अधिक उनकी पत्नी सावित्रीबाई की जितनी सराहना की जाए कम हैं। उन्होंने अपने पति को सम्पूर्ण सहयोग दिया, उनके साथ रहकर मुसीबतों का डटकर सामना किया, कष्ट तथा यातनाएं सहीं। ऊँचें वर्गों की उच्च शिक्षित महिलाओं में भी ऐसी त्यागी महिला विरला ही होगी।

निष्कर्ष:- भारत की प्रथम अध्यापिका बनकर उन्होंने नारी सामाजिक चेतना आन्दोलन का शुभारम्भ किया और यहीं से स्त्री मुक्ति आन्दोलन की गंगोत्री निकली। सावित्रीबाई ने शूद्रातिशूद्रों एवं स्त्री जाति को ज्ञान दान करके सामाजिक पुनर्जागरण के आधुनिक युग का द्वार सबके लिए खोला। वे महिला सशक्तिकरण अवधारणा की आद्य प्रवर्तक थीं। भारत सरकार के डाक विभाग ने 10 मार्च, 1998 को सावित्रीबाई फुले स्मारक डाक टिकट जारी करते हुए गौरव का अनुभव किया।